Saturday, 17 November 2012

हवा !


                हवा 


"अबे, यार कुछ सुना तुम दोनों ने ?"

" क्या ", आकाश ने पूछा |

"यार, यश अंकल का बेटा भी उन्हें छोड़ कर चला गया ...मेरठ अपनी बीवी के साथ, " विनोद बोला |

"अच्छा कब " रमेश ने हैरानी व्यक्त की |

"परसों की बात है ! यार " विनोद बोला |

" पर, यार उसकी शादी को तो अभी छह महीने ही हुए थे, अपनी बीमार माँ के बारे में भी उसने कुछ नहीं सोचा, " रमेश के  स्वर में झुंझलाहट स्पष्ट थी |

"अबे, शादी के बाद अपनी बीवी के बारे में ज्यादा सोचना पड़ता है " विनोद बोला |

"हाँ यार, ये तो है साली आजकल की हवा ही ख़राब है " रमेश ने दुःख से कहा |

"तू इतनी देर से क्या सोच रहा है ?" विनोद ने चेतन के सर पर हल्की चपत मारी |

दबी आवाज़ में चेतन ने जवाब दिया " कुछ नहीं यार, अगले महीने मेरे बड़े भाई की शादी है ...... यही सोच रहा था "


-चिन्मय उत्तम  






Friday, 16 November 2012

वहशीपन



एक   पल  में  कितने  रूप  बदलते   है   लोग  यहाँ |
नक़ाब   पर   नक़ाब   ओढ़े   रहते   है   लोग   यहाँ ||

निकलता   है   प्यार   बाँटने   को   जो   भी   शख्स,
नफरत भरी मुस्कान से स्वागत करते है लोग यहाँ |

मोहब्बत इक नियामत-ए-ख़ुदा*  है, सब  कहते  है,
आशिकों  को  फिर  भी  दीवाना कहते है लोग यहाँ |

झांक  नहीं  पाए,  ठीक  से  अभी,   दिल   में   अपने,
बात  मगर, चाँद  पर  रहने  की  करते  है लोग यहाँ |

दो  सच्चे  प्रेमी  जिन्हें   गुनगुना   भी   नही   सकते,
जीस्त-ए-साज़* पर ऐसे नग्मे  गाते  है  लोग   यहाँ |

जो  वहशीपन  छुपा  है  इनके अपने  दिल में अर्पण,
वैसा   ही  अक्स   औरो  में  देखते   है   लोग    यहाँ ||

                                                       -अर्पण (14 फरवरी 1998) 


*नियामत-ए-ख़ुदा = भगवान का तोहफा 
*जीस्त-ए-साज़     = ज़िन्दगी का साज़ 



Thursday, 15 November 2012

लव मैरिज


लव - मैरिज


   एक मुर्गा होता है 

                   एक लोमड़ी होती है

   एक मुर्गी होती है 

              एक सियार होता है


   लोमड़ी को मुर्गे से

          सियार को मुर्गी से 

लव हो जाता है


                कहीं कोई हैरानी नहीं

   ना ही कोई अचम्भा

            चूँकि  ' लव ' आज कल

 ज़रिया बन गया है

            मैरिज करने का |

                                                                                                                                                     - चिन्मय उत्तम 

याद आ रहे हो -2



जुदाई में आपकी क्या-क्या सह गए है,
प्यार  कर  के,  अब  हम  थक  गए  है,
तेरी   ही   गली   में  आकर  ठहर  गई,
हवा  के  संग  हम  जब - जब  गए  है,

खुशबू  से  महका  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

चाँद जाने क्यों आज उदास-उदास है,
हवा  में  भी आज अजीब सी प्यास है,
शब  कुछ   ज्यादा   गहरी   है   आज,
सहर आएगी, इसकी भी कहाँ आस है,

सांस  से  अटका  रहे   हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

दिल का दर्द निकला आँखों के रास्ते,
क्या - क्या  मैं  सह  गया तेरे वास्ते,
ख़वाब  में  भी  कहाँ  सोचा  था  मैंने,
मेरी डगर से अलग होंगे  तेरे  रास्ते,

रास्ते से वापिस आ रहे हो |
तुम बहुत याद  आ रहे हो ||

बुलाता हूँ किसी को,नाम तेरा निकलता है,
आईने   में    भी  तेरा  अक्स   दिखता   है,
दिल  गायब  हो जाता है, सीने से हर रोज़,
ढूंढ़ता   हूँ  तो  तेरी  गली  में  मिलता   है,

अश्क से सूखते जा रहे हो |
तुम बहुत याद आ रहे  हो ||

                                                             -अर्पण (1 जनवरी 2000)







याद आ रहे हो -1



तुम  नहीं   हो   तो   कुछ   भी   नहीं  है,
है  सब - कुछ  मगर  फिर  भी  कमी है,
तुम क्या चले गए,कोई पास नहीं आता,
मैं  किसी  से, कोई  मुझसे खुश नहीं है |

तुम  ही  आ - जा  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

आँखें   बंद   करके  बैठा  हूँ  चुप-चाप,
कोयल भी  बहुत  चुप - चुप  है  आज,
उड़ने की कोशिश में फड़फड़ा भर पाये,
मेरी  सोच के परिंदे भूल गये परवाज़ |

तन्हाई  में  बुला  रहे   हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

जहन अज्ञात की तरफ भागा जा रहा है,
मैं  दिल  को, दिल  मुझे  समझा  रहा है,
आँखें   है  तो  पत्थर,  मगर   गीली   है,
आँसू पानी होकर भी सुखा  जा  रहा  है |

आँसू   से  धुंधला  रहे  हो |

तुम बहुत याद आ रहे हो ||

तुमसे ही रोशन थी मेरी सुबह-ओ-शाम,
इस   हिज्र   में   तेरे   प्यार  को  सलाम,
हर   दर्द ,  हर    गम    भूल   जाता   था,
आँखें बंद करके जब लेता था तेरा नाम |


रोम - रोम में समा रहे हो |

तुम बहुत याद आ रहे हो ||

                                                                  -अर्पण (28 मार्च 2000)






जुगनू



" जुगनू और मैं "
5 Oct. 1999 


आपने अँधेरी रात में जुगनुओ को चमकते हुए जरूर देखा होगा | जुगनू थोड़ी देर के लिए चमकते है फिर देर तक अन्धेरें में खोये रहते है | और फिर थोड़ी देर बाद चमकते है | दूसरी बार जब वो चमकते है तो किसी और दिशा में चमकते है, दूसरी बार जुगनू को चमकते हुए देखने के लिए हमें चारो तरफ़ बराबर नज़र रखनी पड़ती है |

ऐसे ही एक रात, मैं बैठा जुगनुओं को देख रहा था | तभी बिल्कुल मेरी आँखों के आगे एक जुगनू चमका और फिर ग़ायब हो गया | बहुत देर बाद जब वो दुबारा चमका तो मैंने उससे पूछा - यार ! तुम इतनी देर तक अन्धेरें में क्यूँ खोये रहते हो, हर वक़्त चमकते क्यूँ नहीं रहते? जुगनू बोला - दोस्त ! ये तो प्रकृति का नियम है, हमें एक बार में सिर्फ एक रोशनी की किरण मिलती है | दूसरी बार रोशनी की किरण पाने के लिए हमें अंधेरों की खाक छाननी पड़ती है, मारा-मारा फिरना पड़ता है., इस दिशा से उस दिशा, तब कहीं जाकर एक किरण मिलती है रोशनी की | 

मैंने सोचा - सच में, यही हाल खुशियों का है, ज़िन्दगी के तमाम दुखों के बीच हमें लगातार खुशियाँ तलाशते रहना चाहिए | कब तक बचेंगी खुशियाँ ? कहीं न कहीं जाकर तो पकड़ में आएँगी ! आप यकीन मानिए, खुशियाँ  हमें कहीं भी, कभी भी मिल सकती है लेकिन इसके लिए जरुरी है कि हम लगातार दुखों को टटोलते रहें, उन्हें उलट-पुलट कर देखते रहें कि शायद कहीं छोटी-मोटी कोई ख़ुशी पड़ी हो | और आप देखना, आपको किसी न किसी कोने में, ख़ुशी पड़ी मिल जाएगी |

फिर मैंने जुगनू से पूछा - तुम्हे निराशा नहीं होती कि रोशनी सिर्फ थोड़ी देर के लिए और अंधेरों का सिलसिला कितना लम्बा ! ये सब तुम्हे निराश नहीं करता ?

जुगनू बोला - नहीं, मैं निराश नहीं होता | हाँ ये सच है कि रोशनी हमें थोड़ी देर के लिए मिलती है मगर इसमें निराश होने वाली कोई बात नहीं | असल में सच तो ये है कि गर ये अन्धेरें न होते तो हमारी रोशनी की किरण कैसे दिखाई देती |

सच में, इंसानी फितरत है कि वो हमेशा ज्यादा की उम्मीद रखता है, उसकी इच्छाएँ कभी पूरी होती | जब भी कोई थोड़ी सी ख़ुशी मिलती है तो हम चाहते है कि और मिलनी चाहिए थी, ये तो बहुत कम है | और हम दुखों को हमेशा कोसते है | मगर हम ये नहीं सोचते कि अगर ये दुःख न आते तो हमें खुशियों से जो ख़ुशी मिलती है, उसे हम कैसे महसूस कर पाते |

-अर्पण 






लौट आता हूँ मैं !



न जाने, क्या है तुझमे, बार - बार,
तुम्हारी तरफ, लौट  आता  हूँ  मैं |

कितना  ही  आपस  में झगड़ लें हम,
कितना ही एक-दूजे से रूठ जाए हम,
कितना    ही,  मैं    खा    लूँ    कसमें,
कि  एक - दूजे  से  नहीं  मिलेंगे हम,

कसमें  भूल  जाता  हूँ  मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||

हर  नापसंद   बात   पर   तुम्हे   डांटना,
मेरी  हर  डांट  पर  तुम्हारे  आँसू बहना,
वो  हर  पल  दुआएँ  करना  मिलने  की,
और जब भी मिलना तो लड़ना-झगड़ना,

झगड़े  भूल  जाता  हूँ   मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||

एक-दुसरे से बिल्कुल अलग है हम,
तुम  उतर  हो,  तो   मैं   दक्षिण   हूँ,
कैसे एक - दुसरे  से मिल जाएँ हम,
तुम  पूरब  हो  तो  मैं   पश्चिम   हूँ,


दिशाएं  भूल  जाता  हूँ  मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||


                                      -अर्पण (31 Aug. 1999 ) 

Wednesday, 14 November 2012

जलन


" जलन "
 (18 July 1999 )

एक रात...
तुम्हारे बारे में सोच रहा था | सोच रहा था कि कैसे तुम हंसती हो, कैसे नाराज़ होती हो, कैसे बात-बात में तुम्हारे आँसू तुम्हारी आँखों का साथ छोड़ देते है | कैसे तुम बातें करती हो, कैसे प्यार से मेरे गले.......

यही सब सोच रहा था कि बादलों के पीछे से चाँद निकलता दिखाई पड़ा | जाने क्यों उसने देखकर भी मुझे अनदेखा कर दिया और नज़र बचाकर चलने लगा | बड़ा अजीब सा व्यवहार था | थोड़ी देर मैंने सोचा और जाने क्या सोचकर मैंने उसे आवाज़ दी | वो रुक तो गया परंतु मेरी तरफ आया नहीं | 

तब मैं ही उसकी तरफ चल दिया और पूछा - क्या बात है मेरे दोस्त, क्या नाराज़ हो मुझसे ? 

बड़ा बेरूखा सा जवाब मिला - तुम्हे क्या फर्क पड़ता है !
  
मुझे कुछ समझ नहीं आया मगर इतना जरूर समझ गया कि वाकई ये मुझसे नाराज़ है | मैंने उसे मनाने के इरादे से कहा - क्या बात है चाँद, आज तो तुम्हारा चेहरा कुछ ज्यादा ही चमक रहा है, क्या नूर निकल रहा है तुम्हारे रुख से, हर जगह, हर तरफ तुम्हारा ही नूर फैला हुआ है | हर नज़र में तुम ही तुम हो !

बड़ी व्यंगात्मक मुस्कान के साथ, मेरी आँखों में आँखें डालकर उसने कहा - क्यों झूठ बोलते हो, तुम्हारी आँखों में तो कोई और ही चाँद बसा है | तुम्हारे रोम-रोम से उसी चाँद की चाँदनी फूट रही है, फिर तुम्हे मेरी क्या जरुरत ?

मुझसे कुछ कहते न बन पड़ा | वो वापिस मुड़ा और अपनी राह चल दिया | मैंने उसे रोकने के लिए हाथ उठाया मगर मेरी आवाज़, मेरे ही अंदर न जाने कहाँ खो गयी  और मेरा हाथ उठा का उठा रह गया | 

                                                                                                                                                -अर्पण 





थोड़ा सा पानी



" थोड़ा सा पानी "
25 Feb. 2000


कल रात मुझे एक सपना आया --

मुझे पता नहीं कहाँ से (शायद तक़दीर से), एक बोलने वाली मछली मिल गई | मैंने उसे अपनी अंजुली में जितना पानी आया उसी में रख लिया | हालाँकि वो बड़े तालाब में रहने वाली मछली थी मगर उसने मेरी अंजुली के थोड़े से पानी में ही रहना सीख लिया और मुझसे कोई शिकायत नहीं की |

हर रोज़ मैं उससे ढेरों बातें करता था, जहाँ भी मैं जाता उसे साथ लेकर जाता | वो भी मुझसे ढेरों बातें करती थी और कई बार तो ऐसी बातें भी जिनसे मैं बोर हो जाता था| मगर ये मैं उसे ज़ाहिर नहीं होने देता था| वो कहती - मुझे यह चाहिए, वो चाहिए ! और मैं पागलों की तरह उसके लिए सब-कुछ करता था, जो भी मुझसे बन पड़ता, और कभी-कभी तो उससे भी कहीं ज्यादा |

कभी-कभी मैं सोचता था कि ये इतने बड़े - खुले तालाब में रहने वाली मछली इस थोड़े से पानी में कैसे रह रही है | मैंने एक-दो बार उससे पूछने की कोशिश भी की मगर उसने बातों का रुख पड़े प्यार से कहीं और मोड़ दिया | वो लम्हे मेरी ज़िन्दगी के शायद सबसे ज्यादा हसीन लम्हे थे | उन दिनों  उसकी आँखों में इतना प्यार, इतना अपनापन देखा कि अपनी किस्मत से मुझे ख़ुद ईर्ष्या होने लगी |

मगर कुछ ही दिनों बाद मेरी नज़र शायद ख़ुद मुझे लग गई | एक दिन मैं और मेरी प्यारी मछली आपस में बातें कर रहे थे | लेकिन वो उस दिन कुछ चुप-चुप थी | मैंने उससे पूछा भी मगर उसने टाल दिया | तभी वो अचानक मेरे हाथ से फिसल गई और पास ही बह रही नदिया की धारा में जा गिरी | मैं उसे पकड़ने के लिए कभी इधर हाथ फैलाता कभी उधर मगर वो पानी के बहाव के साथ-साथ बही जा रही थी और लगातार मुझसे दूर होती जा रही थी | मेरी हर संभव कोशिश के बावजूद भी वो मुझसे दूर होती गई और आखिर में जाकर उसी खुले बड़े तालाब में चली गई |

मैं कई दिनों तक उसी किनारे पर बैठा रहा इस उम्मीद में कि वो दुबारा किनारे पर आएगी मुझसे मिलने के लिए, मेरा हाथ थामने के लिए | वो कैसे रहेगी मेरे बगैर - आखिर कितना प्यार करती थी वो मुझे | तो क्या हुआ ? अगर उसे इतना बड़ा खुला तालाब दुबारा मिल गया | जहाँ वो आसानी से तैर सकती थी, जहाँ चाहे वहां घूम-फिर सकती थी| 

नहीं - नही ! वो वापिस लौट आएगी ! मुझे यही लगता रहा |

एक के बाद एक दिन गुजरते गए मगर वो नही आयी| क्यों वो अचानक, एकदम से, मुझे छोड़कर चली गई ? मुझसे कुछ कहा-सुना भी नहीं | 

क्या अब वो मेरी अंजुली के थोड़े से पानी में नहीं रहना चाहती थी ? क्या उसे अब ये लगने लगा था कि मेरी अंजुली के थोड़े से पानी में रहकर उसने भूल की थी? 

क्या वो प्यार.......

क्या अब उसे ये थोड़ा सा पानी..........................  !!

सपनों का बिखरना


" सपनों  का बिखरना "
 ( 14 March 2000 )

दिल  में  ज़ख्मों  का  मेला सा होता है |
सपनों का बिखरना कुछ ऐसा होता है ||

कैसे  कोई  अचानक  यूँ  बदल  जाता  है,
जन्मों  का  रिश्ता  पल में बदल जाता है,
सचमुच  परिवर्तन  दुनिया  का दस्तूर है,
बदलते मौसम में हर कोई बदल जाता है|

बदलता मौसम कुछ तेरे जैसा होता है |
सपनों का बिखरना कुछ ऐसा होता है ||

जो भी लम्हे हमनें प्यार में बिताये है,
पहलें  यादें  थी,  अब  यादों के साये है,
मैं  वादे   लेता  था  जन्मों   के   उससे,
जो  कुछ  पल  भी  साथ न रह पाये है |

जन्मों  का  साथ  जाने  कैसा  होता  है |
सपनों का बिखरना कुछ ऐसा होता है ||

सुना   है   ये   कुदरत   का   नियम   है,
सूरज दिन में, चाँद रात में निकलता है,
मगर    कुछ   ऐसे   भी   बदनसीब   है,
जिनका  सूरज भी रात में निकलता है,

वो  नहीं  जानते  दिन  कैसा  होता   है |
सपनों का बिखरना कुछ ऐसा होता है ||

गहराई   में  जाकर  सच्चे  मोती  मिलते है,
मिट्टी    में   मिलकर   ही   अंकुर  फूटते   है,
आप किनारे पे खड़े रहकर,किनारा कर गए,
डूबने  वाले  तुझे  अब  भी  पुकारा  करते है |

साहिल   पर   डूबने  का  दर्द जैसा  होता  है |
सपनों  का   बिखरना  कुछ  ऐसा  होता   है ||
                                                 -अर्पण 

Tuesday, 13 November 2012

दो जून रोटी

16 Aug 1998 

इंसान,   इंसान   को    मारता    रहा |
शैतान  खड़ा  तमाशा   देखता    रहा ||

मन्दिर - मस्जिद  को लेकर लड़ मरे,
धर्म   हर   पल   बदनाम  होता   रहा |

परिवार   के   रिश्ते   निभा   न  सका,
भगवान    से    नाता    जोड़ता    रहा |

अफवाहों  में  उड़  गया, ज्यों  तिनका,
अपने ही भाइयों का गला काटता रहा |

इंसान  मौत  से  डरता  होता था  कभी,
अब मौत को इंसाने-खौफ सताता रहा |

धर्म   के   नाम   पर   रूपये   लुटा   दिए,
बेसहारों को सहारा देने से कतराता रहा |

जिस  माँ-बाप  ने  पाला  उसको उम्र भर,
दो  जून  रोटी  वास्ते  उन्हें तरसाता रहा ||

                                                    -अर्पण

Monday, 12 November 2012

उनकी ख़ुशी थी

15 jun 1998


इंसानी  ज़िन्दगी  में  कुछ ख़्वाब ऐसे भी है |
जो   कभी   सच   न   हो,  तभी  अच्छा   है ||

प्यार  बहुत  कुछ  है आदमी  के  लिए, माना,
मगर  सब - कुछ  न   बने  तभी  अच्छा   है |

वक़्त   का   क्या   भरोसा   कब  बदल   जाये,
हाल कोई पूछे तो कहना, फ़िलहाल अच्छा है |

अपनी  खुशियों  को  लुटाकर  दोनों  हाथों  से,
दूजों के गम समेटना,  कभी-कभी  अच्छा  है |

जन्म-मरण  का  साथ  महज़  इक  ख़्वाब है,
जो  जितना  साथ  निभा  दे, उतना अच्छा है |

उनकी   ख़ुशी   थी  कि  प्यार  'अर्पण'  कर  दूँ,
फिर  नहीं  सोचा,  बुरा  है  या  कि  अच्छा  है ||

                                                                     -अर्पण





Saturday, 10 November 2012

उसूल

उसूल 

बात बम्बई की है | सारी कॉलोनी का सफाया कर दिया था --- हुडदंगियों ने | चाल पर चाल खडी हो चुकी थी | ऐसे एक चाल में एक कन्या निर्वस्त्र नहा रही थी | एकाएक इतने लोग देखकर वो सकपका गई |

  " बहन आराम से कपडे पहन लो और बाहर आ जाओ" - एक युवक ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया |


कन्या को लगा की कहीं न कहीं इश्वर तो है ही और तुरंत बाहर आ गई | उसी चाल के बाहर एक के बाद एक उन्हीं युवकों ने उसकी दुर्दशा की -


-- यहाँ तक की वो बेहोश और अधमरी-सी हो गयी | बेहोश होते हुए वह बुदबुदाई , " यही करना था तो मुझे वस्त्र क्यों पहनने दिए |


अब मुझे मौत दो ----मौत " ... !


युवक बोला, " आखिर हमारे भी कुछ उसूल हैं "|  



                                                                                                                               डॉ. रमेश सक्सेना ' गश'
                                                                                                                                                                    साभार : कादम्बिनी ( अक्टूबर,९३)