Thursday, 15 November 2012

लव मैरिज


लव - मैरिज


   एक मुर्गा होता है 

                   एक लोमड़ी होती है

   एक मुर्गी होती है 

              एक सियार होता है


   लोमड़ी को मुर्गे से

          सियार को मुर्गी से 

लव हो जाता है


                कहीं कोई हैरानी नहीं

   ना ही कोई अचम्भा

            चूँकि  ' लव ' आज कल

 ज़रिया बन गया है

            मैरिज करने का |

                                                                                                                                                     - चिन्मय उत्तम 

याद आ रहे हो -2



जुदाई में आपकी क्या-क्या सह गए है,
प्यार  कर  के,  अब  हम  थक  गए  है,
तेरी   ही   गली   में  आकर  ठहर  गई,
हवा  के  संग  हम  जब - जब  गए  है,

खुशबू  से  महका  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

चाँद जाने क्यों आज उदास-उदास है,
हवा  में  भी आज अजीब सी प्यास है,
शब  कुछ   ज्यादा   गहरी   है   आज,
सहर आएगी, इसकी भी कहाँ आस है,

सांस  से  अटका  रहे   हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

दिल का दर्द निकला आँखों के रास्ते,
क्या - क्या  मैं  सह  गया तेरे वास्ते,
ख़वाब  में  भी  कहाँ  सोचा  था  मैंने,
मेरी डगर से अलग होंगे  तेरे  रास्ते,

रास्ते से वापिस आ रहे हो |
तुम बहुत याद  आ रहे हो ||

बुलाता हूँ किसी को,नाम तेरा निकलता है,
आईने   में    भी  तेरा  अक्स   दिखता   है,
दिल  गायब  हो जाता है, सीने से हर रोज़,
ढूंढ़ता   हूँ  तो  तेरी  गली  में  मिलता   है,

अश्क से सूखते जा रहे हो |
तुम बहुत याद आ रहे  हो ||

                                                             -अर्पण (1 जनवरी 2000)







याद आ रहे हो -1



तुम  नहीं   हो   तो   कुछ   भी   नहीं  है,
है  सब - कुछ  मगर  फिर  भी  कमी है,
तुम क्या चले गए,कोई पास नहीं आता,
मैं  किसी  से, कोई  मुझसे खुश नहीं है |

तुम  ही  आ - जा  रहे  हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

आँखें   बंद   करके  बैठा  हूँ  चुप-चाप,
कोयल भी  बहुत  चुप - चुप  है  आज,
उड़ने की कोशिश में फड़फड़ा भर पाये,
मेरी  सोच के परिंदे भूल गये परवाज़ |

तन्हाई  में  बुला  रहे   हो |
तुम बहुत याद आ रहे हो ||

जहन अज्ञात की तरफ भागा जा रहा है,
मैं  दिल  को, दिल  मुझे  समझा  रहा है,
आँखें   है  तो  पत्थर,  मगर   गीली   है,
आँसू पानी होकर भी सुखा  जा  रहा  है |

आँसू   से  धुंधला  रहे  हो |

तुम बहुत याद आ रहे हो ||

तुमसे ही रोशन थी मेरी सुबह-ओ-शाम,
इस   हिज्र   में   तेरे   प्यार  को  सलाम,
हर   दर्द ,  हर    गम    भूल   जाता   था,
आँखें बंद करके जब लेता था तेरा नाम |


रोम - रोम में समा रहे हो |

तुम बहुत याद आ रहे हो ||

                                                                  -अर्पण (28 मार्च 2000)






जुगनू



" जुगनू और मैं "
5 Oct. 1999 


आपने अँधेरी रात में जुगनुओ को चमकते हुए जरूर देखा होगा | जुगनू थोड़ी देर के लिए चमकते है फिर देर तक अन्धेरें में खोये रहते है | और फिर थोड़ी देर बाद चमकते है | दूसरी बार जब वो चमकते है तो किसी और दिशा में चमकते है, दूसरी बार जुगनू को चमकते हुए देखने के लिए हमें चारो तरफ़ बराबर नज़र रखनी पड़ती है |

ऐसे ही एक रात, मैं बैठा जुगनुओं को देख रहा था | तभी बिल्कुल मेरी आँखों के आगे एक जुगनू चमका और फिर ग़ायब हो गया | बहुत देर बाद जब वो दुबारा चमका तो मैंने उससे पूछा - यार ! तुम इतनी देर तक अन्धेरें में क्यूँ खोये रहते हो, हर वक़्त चमकते क्यूँ नहीं रहते? जुगनू बोला - दोस्त ! ये तो प्रकृति का नियम है, हमें एक बार में सिर्फ एक रोशनी की किरण मिलती है | दूसरी बार रोशनी की किरण पाने के लिए हमें अंधेरों की खाक छाननी पड़ती है, मारा-मारा फिरना पड़ता है., इस दिशा से उस दिशा, तब कहीं जाकर एक किरण मिलती है रोशनी की | 

मैंने सोचा - सच में, यही हाल खुशियों का है, ज़िन्दगी के तमाम दुखों के बीच हमें लगातार खुशियाँ तलाशते रहना चाहिए | कब तक बचेंगी खुशियाँ ? कहीं न कहीं जाकर तो पकड़ में आएँगी ! आप यकीन मानिए, खुशियाँ  हमें कहीं भी, कभी भी मिल सकती है लेकिन इसके लिए जरुरी है कि हम लगातार दुखों को टटोलते रहें, उन्हें उलट-पुलट कर देखते रहें कि शायद कहीं छोटी-मोटी कोई ख़ुशी पड़ी हो | और आप देखना, आपको किसी न किसी कोने में, ख़ुशी पड़ी मिल जाएगी |

फिर मैंने जुगनू से पूछा - तुम्हे निराशा नहीं होती कि रोशनी सिर्फ थोड़ी देर के लिए और अंधेरों का सिलसिला कितना लम्बा ! ये सब तुम्हे निराश नहीं करता ?

जुगनू बोला - नहीं, मैं निराश नहीं होता | हाँ ये सच है कि रोशनी हमें थोड़ी देर के लिए मिलती है मगर इसमें निराश होने वाली कोई बात नहीं | असल में सच तो ये है कि गर ये अन्धेरें न होते तो हमारी रोशनी की किरण कैसे दिखाई देती |

सच में, इंसानी फितरत है कि वो हमेशा ज्यादा की उम्मीद रखता है, उसकी इच्छाएँ कभी पूरी होती | जब भी कोई थोड़ी सी ख़ुशी मिलती है तो हम चाहते है कि और मिलनी चाहिए थी, ये तो बहुत कम है | और हम दुखों को हमेशा कोसते है | मगर हम ये नहीं सोचते कि अगर ये दुःख न आते तो हमें खुशियों से जो ख़ुशी मिलती है, उसे हम कैसे महसूस कर पाते |

-अर्पण 






लौट आता हूँ मैं !



न जाने, क्या है तुझमे, बार - बार,
तुम्हारी तरफ, लौट  आता  हूँ  मैं |

कितना  ही  आपस  में झगड़ लें हम,
कितना ही एक-दूजे से रूठ जाए हम,
कितना    ही,  मैं    खा    लूँ    कसमें,
कि  एक - दूजे  से  नहीं  मिलेंगे हम,

कसमें  भूल  जाता  हूँ  मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||

हर  नापसंद   बात   पर   तुम्हे   डांटना,
मेरी  हर  डांट  पर  तुम्हारे  आँसू बहना,
वो  हर  पल  दुआएँ  करना  मिलने  की,
और जब भी मिलना तो लड़ना-झगड़ना,

झगड़े  भूल  जाता  हूँ   मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||

एक-दुसरे से बिल्कुल अलग है हम,
तुम  उतर  हो,  तो   मैं   दक्षिण   हूँ,
कैसे एक - दुसरे  से मिल जाएँ हम,
तुम  पूरब  हो  तो  मैं   पश्चिम   हूँ,


दिशाएं  भूल  जाता  हूँ  मैं |
फिर  लौट  आता   हूँ   मैं ||


                                      -अर्पण (31 Aug. 1999 )