Thursday, 15 November 2012

जुगनू



" जुगनू और मैं "
5 Oct. 1999 


आपने अँधेरी रात में जुगनुओ को चमकते हुए जरूर देखा होगा | जुगनू थोड़ी देर के लिए चमकते है फिर देर तक अन्धेरें में खोये रहते है | और फिर थोड़ी देर बाद चमकते है | दूसरी बार जब वो चमकते है तो किसी और दिशा में चमकते है, दूसरी बार जुगनू को चमकते हुए देखने के लिए हमें चारो तरफ़ बराबर नज़र रखनी पड़ती है |

ऐसे ही एक रात, मैं बैठा जुगनुओं को देख रहा था | तभी बिल्कुल मेरी आँखों के आगे एक जुगनू चमका और फिर ग़ायब हो गया | बहुत देर बाद जब वो दुबारा चमका तो मैंने उससे पूछा - यार ! तुम इतनी देर तक अन्धेरें में क्यूँ खोये रहते हो, हर वक़्त चमकते क्यूँ नहीं रहते? जुगनू बोला - दोस्त ! ये तो प्रकृति का नियम है, हमें एक बार में सिर्फ एक रोशनी की किरण मिलती है | दूसरी बार रोशनी की किरण पाने के लिए हमें अंधेरों की खाक छाननी पड़ती है, मारा-मारा फिरना पड़ता है., इस दिशा से उस दिशा, तब कहीं जाकर एक किरण मिलती है रोशनी की | 

मैंने सोचा - सच में, यही हाल खुशियों का है, ज़िन्दगी के तमाम दुखों के बीच हमें लगातार खुशियाँ तलाशते रहना चाहिए | कब तक बचेंगी खुशियाँ ? कहीं न कहीं जाकर तो पकड़ में आएँगी ! आप यकीन मानिए, खुशियाँ  हमें कहीं भी, कभी भी मिल सकती है लेकिन इसके लिए जरुरी है कि हम लगातार दुखों को टटोलते रहें, उन्हें उलट-पुलट कर देखते रहें कि शायद कहीं छोटी-मोटी कोई ख़ुशी पड़ी हो | और आप देखना, आपको किसी न किसी कोने में, ख़ुशी पड़ी मिल जाएगी |

फिर मैंने जुगनू से पूछा - तुम्हे निराशा नहीं होती कि रोशनी सिर्फ थोड़ी देर के लिए और अंधेरों का सिलसिला कितना लम्बा ! ये सब तुम्हे निराश नहीं करता ?

जुगनू बोला - नहीं, मैं निराश नहीं होता | हाँ ये सच है कि रोशनी हमें थोड़ी देर के लिए मिलती है मगर इसमें निराश होने वाली कोई बात नहीं | असल में सच तो ये है कि गर ये अन्धेरें न होते तो हमारी रोशनी की किरण कैसे दिखाई देती |

सच में, इंसानी फितरत है कि वो हमेशा ज्यादा की उम्मीद रखता है, उसकी इच्छाएँ कभी पूरी होती | जब भी कोई थोड़ी सी ख़ुशी मिलती है तो हम चाहते है कि और मिलनी चाहिए थी, ये तो बहुत कम है | और हम दुखों को हमेशा कोसते है | मगर हम ये नहीं सोचते कि अगर ये दुःख न आते तो हमें खुशियों से जो ख़ुशी मिलती है, उसे हम कैसे महसूस कर पाते |

-अर्पण 






No comments:

Post a Comment