Wednesday, 14 November 2012

जलन


" जलन "
 (18 July 1999 )

एक रात...
तुम्हारे बारे में सोच रहा था | सोच रहा था कि कैसे तुम हंसती हो, कैसे नाराज़ होती हो, कैसे बात-बात में तुम्हारे आँसू तुम्हारी आँखों का साथ छोड़ देते है | कैसे तुम बातें करती हो, कैसे प्यार से मेरे गले.......

यही सब सोच रहा था कि बादलों के पीछे से चाँद निकलता दिखाई पड़ा | जाने क्यों उसने देखकर भी मुझे अनदेखा कर दिया और नज़र बचाकर चलने लगा | बड़ा अजीब सा व्यवहार था | थोड़ी देर मैंने सोचा और जाने क्या सोचकर मैंने उसे आवाज़ दी | वो रुक तो गया परंतु मेरी तरफ आया नहीं | 

तब मैं ही उसकी तरफ चल दिया और पूछा - क्या बात है मेरे दोस्त, क्या नाराज़ हो मुझसे ? 

बड़ा बेरूखा सा जवाब मिला - तुम्हे क्या फर्क पड़ता है !
  
मुझे कुछ समझ नहीं आया मगर इतना जरूर समझ गया कि वाकई ये मुझसे नाराज़ है | मैंने उसे मनाने के इरादे से कहा - क्या बात है चाँद, आज तो तुम्हारा चेहरा कुछ ज्यादा ही चमक रहा है, क्या नूर निकल रहा है तुम्हारे रुख से, हर जगह, हर तरफ तुम्हारा ही नूर फैला हुआ है | हर नज़र में तुम ही तुम हो !

बड़ी व्यंगात्मक मुस्कान के साथ, मेरी आँखों में आँखें डालकर उसने कहा - क्यों झूठ बोलते हो, तुम्हारी आँखों में तो कोई और ही चाँद बसा है | तुम्हारे रोम-रोम से उसी चाँद की चाँदनी फूट रही है, फिर तुम्हे मेरी क्या जरुरत ?

मुझसे कुछ कहते न बन पड़ा | वो वापिस मुड़ा और अपनी राह चल दिया | मैंने उसे रोकने के लिए हाथ उठाया मगर मेरी आवाज़, मेरे ही अंदर न जाने कहाँ खो गयी  और मेरा हाथ उठा का उठा रह गया | 

                                                                                                                                                -अर्पण 





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